दोहा - परम दुखी भा परम वीर। संजय दुखड़ा सुनात।।
अँसुअन पोंछत अर्जुन को। बोल ब्रह्म यह बात।।
अँसुअन पोंछत अर्जुन को। बोल ब्रह्म यह बात।।
अति बिचित्र यह मोह लपेटौ। शेर नपुंसक क्यूँ बन बैठौ।।
कीरति छोड़ न स्वरग मिलेगौ । महापुरुष कैसे बनेगौ ।।
तोरा दिल दुर्बल कब भयउ। आ चल वीर जुद्ध मह खड़उ।।
पारथ कहे कैसे लड़ि पाऊं। भीष्म गुरु को आँख दिखाऊं।।
पूजनीय सब कैसे मारूँ। जासे भली भिक्षा मैं पाऊं।।
जानत नहीं लड़ना या लड़-ना। जीत चखूँ या होए हारना।।
जिन्हे मारि अब कछु नहिं चाहि। वे ही दो-दो हाथ लडाई।।
मैं क्या मारि मोह मोहे मारी। माधव मैं अब सरन तुम्हारी।।
कल्यान कछु सूझत नाही। तुम ही हो गुरु ज्ञान गोसाई।।
जुद्ध भार अब नहीं है ढोना। इतना कह कपिध्वज भए मौना।।
दोहा - तब श्री गीता सुधा बही। जय गिरिधर गोपाल।।
मंद-मंद मुसकाई कर। समझावें नंदलाल।।
हसहिं योग्य क्यूँ शोक करे तू। पंडित जैसे वचन कहे तू ।।
जिनहिं चले अरु नहिं गए प्राना। जेइ पंडित नहिं शोक है जाना।।
मान नहीं हम दोउ सब राजा। अति भू काल करत नहिं काजा।।
तात हरि हर काल में जानो। भूत भविस्य सबन में मानो।।
बाल से बूढ़ सरीर हो जैसे। बदल सरीर जीव सब तैसे।।
कबहुँ जासु मोहित नहीं धीरा। धीर वही मारी मन तीरा।।
विषय भोग संजोग विनासी। सुख दुख सहन करी अविनासी।।
सुख दुख जेई नर समझ समाना। सोइ जानत निरवान कमाना।।
असत जगत की नहीं है सत्ता। सत मोये जानें तत्त्व के ज्ञत्ता।।
नाशरहित जग पिता तू माना। मार न सकत ब्रह्म मैं जाना।।
तन विनासी मैं जीवहिं अंसी। निडर जुद्ध कर चल कुरुवंसी।।
नित्य सनातन जीव आतमा। मारत कबहुँ न होये खातमा।।
दोहा - अजर अमर आपहुँ जान। का मारत मरवात।।
चीर नए जस ग्रहन कर। तजि नूतन तन पात।।
अंस मोर नहिं आयुध काटा। पावक तोए न जलत गलाता।।
पवन सुखा नहिं सकत अभेदा। कहँ नउ अचल असोस अछेदा।।
कवन सो हरि गुण होत न थामी। लागत दोउ नाम अरु नामी।।
सबहिं विकार अचिंत न जानी। अस विचार तोये सोक भुलानी।।
मगर यदि जाने जन मरना। तबहुँ तू वीर सोक नहीं करना।।
जेहि कारन मारन फिर जनना । जो जनमत ताको तय हनना।।
प्रगट कहाँ नहीं होत प्रसूता। दीख न तबहुँ जात जमदूता।।
केवल धीर बीच कौ खेला। फिर कह चिंत सोक मह चेला।।
दोहा - अचरज देखि स्वयं महा। कोऊ तत्त्व बतलात।
विसमय साधू सुनत सब। कोउ सुन समझ न पात।।
छतरिय धरम जुद्ध मह जीना। डरपत नाहिं परम पद लीना।।
भागवान सुर लोक है पाना। छतरिय परम करम यही जाना।।
किन्तु अपन पद पीछ करैगौ। निंदित कायर पाप परैगौ।।
जुग-जुग सब तोये कायर जानी। काल से बदतर अपयस मानी।।
जिन महारथि सम्मान तू पावा। डरप-डरप अपमान करावा।।
दुसमन करि निंदा देइ गारी। तब करि सोक तू होये दुखारी।।
अब करि निश्चय मोरे मीता। फरक नहीं कुरबान या जीता।
बीरगति सुरलोक दिलावा। राज भोग रनजीत है पावा।।
हार जीत दुख सुखी समाना। करि निस पाप जुद्ध मह जाना।।
ज्ञानजोग यह सब तू जानी। अब सुनि करम जोग मैं गानी।।
दोहा - भओ बंधन यह जोग तोर। करम राज करि चूर।।
जासु जोग बस नैक कर। जनम मरण भय दूर।।
अचल जोगि बुद्धि निस कामा। मरकट मति अति भेद सकामा।।
करम फलहिं भोगी मन प्यारा। केवल वेद वाक जेइ न्यारा।।
स्वरग से ऊँच कछू नहीं मानी।। ते नर मोहित मूरख जानी।।
बेतुक बोल बिसय नर होई। मोमें अचल मति नहिं सोई।।
वेद भोग साधन बतलावे। तिन आसक्त तू हो ना पावे।
सुख दुख आदि द्वन्द से दूरा। हरि में अचल अपन मह पूरा।।
छोड़ हरि नहीं कोउ पिपासा। मन स्वाधीन न काउ की आसा।।
ब्राह्मण ब्रह्म नदीशा जाना। मति नहिं सरसी वेद खपाना।।
तेरो करमन ही अधिकारा। फल कौ का अचार तू डारा।।
फल हेतु नहिं आपहिं माना। करम करहिं नहिं आलस लाना।।
दोहा - चाहे सफल विफल मिले। ना हँसि ना तू रोई।।
लेवत सम बुद्धि सरन। हरि फल हेतु होई।।
नीच दीन कहि मैं सब करता। सम मति पुन्य पाप नहीं भरता।।
तजि फल करम जुक्त जेहि जोगी। पावत परम प्रेम पद होगी।।
दलदल मोह करी जब पारा। तीनहुँ लोक भोग सब खारा।।
नाना बचन सुनी मम मीता। मन क्रम बचन होये बिचलीता।।
जैसे चितवत चंद चकोरा। करम जोग तस हरि मन जोरा।।
तब लगि अर्जुन पूछउँ श्यामा।। कैसे रहत धीर जेहि थामा।।
सुनहुँ सखा अग नर की नीति। रहत न काम रहे बस प्रीती।।
तन सुख चाहि काम कहलावे। तुम सुख पाहि प्रेम जो पावे।।
दोहा - राग द्वेष भय क्रोध नहीं। ते नर साधू समान।।
प्रति अनु कूल न फरक पड़े। धीर धुरंधर जान।।
कच्छप अंग समेटहिं जैसे। भोग से जोग हटावहिं तैसे।।
पर केवल तु भोग से भागा। मन आसक्त छूट नहिं रागा।।
जे जग आसक्ती मन होई। बड़न-बड़न गो रौंदत सोई।।
हल आसक्ति हरि मन होई। सुमिर-सुमिर हरि नामहुँ सोई।।
मन मह चिन्तन बिसय बसाई। भये आसक्त कामना छाई।।
काम रुकावट लाल हो नैना। मूढ़ भाव आवेस जनैना।।
सुध भूलत मति मूढ़ है जाकी। ज्ञान बुद्धि बरबाद हु ताकी।
बुद्धि हीनता पसु है मानी। चिन्तन चिन्ता चिता समानी।।
पर जे राग रहित करि भोगा। सारथि कुसल सन्त मन होगा।।
सुख सागर मन दुःख नहिं लेसा। मन भगवान पहुँच नहिं ठेसा।।
दोहा - सुध निसचयात्मिका नहीं। गो मन बनत गुलाम।।
रहे अशांत मन सदा कुभाव। दुख वहीं बस जहँ काम।।
हरत पवन जैसे जलयाना। तैसे हरि मन गो बलवाना।
सारथि सम बुद्धि निस कामा। गो घोटक जेई लागि लगामा।।
जीव परम सुख रात है जाना। जागत जोगी परम सुख साना।।
नसवर सुख जेहि जीवन जागा। तेहि मुनि रात करत वैरागा।।
सब सरिता जस मिलत समाना। सागर अचल न विचल कराना।।
तैसे भोग मिलत नर धीरा। बिनु विकार सह संत सरीरा।।
परम सांति जेहि त्याग में होई। चाहत भोग सपन नहिं सोई।
अहम् काम मनमानी तोरी। ममता डोरी हरि से जोरी।।
दोहा - अर्जुन यही गति जोगी। मोह सून्य निस पाप ।।
अंतकाल जो भी मन में। सुमिरत मोको प्राप।।
सोरठा - दूसरौ अध्याय खतम। सांख्य जोग जस नाम।।
जोगी पावे सुख परम। भोगी होत निकाम।।