दोहा - तुलसी जी से प्रेरणा। कृष्ण कृपा की श्वास ।।
चौपाइअन गीतासुधा। लिख दासन कौ दास।।
कौर पिता सञ्जयहु बोले। धरम धरा में कितने शोले।।
मोरे अरु पितु जिनके पाण्डु। कुरुछेत में करौ का कांडु।।
संजय ने फिर दियौ जवाबू। देखि सैन्य दुरियोधन बाबू।।
कहेउ द्रौण से सुत बड़ौ त्यारो। शौर्य पाण्डु शेरों कौ न्यारो।।
सातिक सैब्य वीर जुधामन्यु। चेकितान पुरुजित अभिमन्यु।।
पाण्डुपूत काशी के राजा। द्रुपद विराट भीम सम काजा।।
सुनहु सैन्य नायक अब मेरे। भीष्म और तुम ही सब घेरे।।
कर्ण विकर्ण वीर भूरिश्रावा। कृपाचार्य अरु अश्वत्थावा।।
भरी शूरवीरों की टोली। हाजिर है प्राणों की बोली।।
भीम हमारो कहा उखारा । पितामह कौ हमें सहारा।
पितामह सबसे बलवाना। इनके रच्छक सबि बन जाना।।
दुरियोधन हर्षित हो आया। सिंघ भीष्म ने संख सुनाया।।
दोहा - बारी-बारी सब बजन लगे। ढोलक संख नगार।।
कौर पिता सञ्जयहु बोले। धरम धरा में कितने शोले।।
मोरे अरु पितु जिनके पाण्डु। कुरुछेत में करौ का कांडु।।
संजय ने फिर दियौ जवाबू। देखि सैन्य दुरियोधन बाबू।।
कहेउ द्रौण से सुत बड़ौ त्यारो। शौर्य पाण्डु शेरों कौ न्यारो।।
सातिक सैब्य वीर जुधामन्यु। चेकितान पुरुजित अभिमन्यु।।
पाण्डुपूत काशी के राजा। द्रुपद विराट भीम सम काजा।।
सुनहु सैन्य नायक अब मेरे। भीष्म और तुम ही सब घेरे।।
कर्ण विकर्ण वीर भूरिश्रावा। कृपाचार्य अरु अश्वत्थावा।।
भरी शूरवीरों की टोली। हाजिर है प्राणों की बोली।।
भीम हमारो कहा उखारा । पितामह कौ हमें सहारा।
पितामह सबसे बलवाना। इनके रच्छक सबि बन जाना।।
दुरियोधन हर्षित हो आया। सिंघ भीष्म ने संख सुनाया।।
दोहा - बारी-बारी सब बजन लगे। ढोलक संख नगार।।
उत्तम रथ घोड़े सफ़ेद। भाई फुफेर पधार।।
बंसीधर पाञ्चजन्य बजाया। देवदत्त अर्जुन का आया।।
भीम पौंड्र महासंख सुनाया। अनंतविजय भीमाग्रज गाया।।
संख सुघोष नकुल दिखलाया। मणिपुष्पक सहदेव सुनाया।।
धरती-अम्बर गुंजन भयउ। कौरव दिल में तीखी चुभउ।।
भारत करत विनत मोहन से। रथ लावो प्रभु सैन्य बीच से।।
जब तक रिपु देखूं मैं कान्हा। तब तक रथ को नहीं हटाना।।
जो राजा दुरबुद्धि साथी। तिन में देखूँ मद के हाथी ।।
अपन देख सब लगि बिस्वादा। ताऊ चाचा दादा परदादा।।
ससुर सखा भैया गुरु मामा। देखत अति बिचलित उर धामा।।
मुख मेरो मधुसूदन सूखौ। शिथिल कम्प तन रूखौ-रूखौ।।
दोहा - तपि तन गांडीवा गिरत। मति मोहित दुःख छाये।।
विजय भोग नहीं राज पद। दुर गति स्वजन मिटाये।।
सपनेहु मन बिसराम न देही। बंधु अपन जेई प्राण लेही।।
अंध ताऊ के सुत भी अंधे। पाप लेत क्यूँ अपने कंधे।।
जासो होए धरम की हानि। कुल कौ धरम हो पानी-पानी।।
कुल में पापाचरन बढ़ैगौ। कुल नारी सब दूष करैगो।।
नरक जाए जेहि कुल बेचारो। संकर होवे वरन हमारो।।
पितृ श्राद्ध से वंचित होइ। अधोगति के बीज बोई।।
तुच्छ भोग काजै क्यूँ मारूँ। हमे ही झाड़े पाप की झाडू।।
मार वे डालें मुझे निहत्ते। श्याम मरूंगा हँसते-हँसते।।
दोहा - अंत में अर्जुन दुखी। छोड़ी तीर-कमान।।
रथ के पाछे बैठि कर। हा प्रभु ! हा भगवान् !
सोरठा - प्रथम कड़ी पूरन विराम। वीर धरम गए भूल।।
जो लेइ भारत नित्य नाम। मारग हटि रिपु धूल।।